स्मार्टवॉच का उतार: क्यों भारत में सिकुड़ रहा है पहनने योग्य गैजेट का बाज़ार
कुछ साल पहले तक भारत में स्मार्टवॉच और फिटनेस बैंड की बिक्री रॉकेट की तरह बढ़ रही थी, लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। IDC और काउंटरपॉइंट के आंकड़ों के आधार पर हम शांति से समझते हैं कि पहनने योग्य उपकरणों का बाज़ार लगातार क्यों घट रहा है।
कुछ साल पहले तक भारत में हर दूसरी कलाई पर एक नई स्मार्टवॉच या फिटनेस बैंड नज़र आने लगा था। सस्ते दामों और तेज़ी से बढ़ते चलन के दम पर यह बाज़ार दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में गिना जाने लगा था। लेकिन अब वही कहानी उलटी दिशा में मुड़ती दिख रही है, और पहनने योग्य उपकरणों की बिक्री लगातार घट रही है।
इस लेख में हम केवल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर बात करेंगे, अपनी ओर से कोई अनुमान या अतिशयोक्ति जोड़े बिना। मकसद यह शांति से समझना है कि यह गिरावट कितनी बड़ी है, कब से चल रही है, और आने वाले समय में इस बाज़ार की दिशा क्या हो सकती है। हर आंकड़ा शोध संस्थानों की रिपोर्टों से लिया गया है।
पूरे बाज़ार में सुस्ती
सबसे पहले पूरे पहनने योग्य उपकरण बाज़ार की तस्वीर देखते हैं, जो चिंता बढ़ाने वाली है। आईडीसी के आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में भारत का पहनने योग्य उपकरण बाज़ार करीब 4 प्रतिशत घटकर लगभग 11.42 करोड़ यूनिट रह गया। यह लगातार दूसरा साल है जब इस बाज़ार में सालाना आधार पर गिरावट दर्ज की गई है।
यह आंकड़ा इसलिए अहम है क्योंकि यह किसी एक श्रेणी की नहीं, बल्कि पूरे वर्ग की सुस्ती को दर्शाता है। जब स्मार्टवॉच से लेकर वायरलेस ईयरबड्स तक सब कुछ एक साथ धीमा पड़ने लगे, तो यह साफ हो जाता है कि बात किसी एक उत्पाद की नहीं, बल्कि ग्राहकों की बदलती सोच और खर्च करने की आदतों की है।
स्मार्टवॉच पर सबसे ज़्यादा मार
इस पूरे बाज़ार में सबसे तीखी गिरावट स्मार्टवॉच के हिस्से आई है, जो कभी इसकी सबसे बड़ी ताकत थी। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में स्मार्टवॉच की शिपमेंट करीब 17.6 प्रतिशत घटकर लगभग 2.89 करोड़ यूनिट रह गई। यह भी लगातार दूसरा साल रहा जब स्मार्टवॉच की बिक्री में इतनी बड़ी गिरावट देखी गई है।
यानी जो श्रेणी कभी इस बाज़ार को आगे खींच रही थी, अब वही सबसे तेज़ी से पीछे खिसक रही है। कलाई पर पहनी जाने वाली इन घड़ियों की चमक ग्राहकों की नज़र में कुछ फीकी पड़ती दिख रही है, और यही बदलाव पूरे उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
गिरावट सिर्फ एक साल की बात नहीं

यह ढलान अचानक नहीं आई, बल्कि इसकी शुरुआत पिछले साल ही हो चुकी थी। आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में पूरे पहनने योग्य उपकरण बाज़ार में पहली बार सालाना गिरावट आई थी, जब यह करीब 11.3 प्रतिशत घटकर लगभग 11.9 करोड़ यूनिट पर आ गया। उसी साल स्मार्टवॉच की बिक्री तो करीब 34.4 प्रतिशत तक लुढ़क गई थी।
तिमाही आधार पर देखें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। रिपोर्ट बताती है कि 2025 की दूसरी तिमाही में स्मार्टवॉच शिपमेंट करीब 28.4 प्रतिशत घटकर लगभग 66 लाख यूनिट रह गई। खास बात यह रही कि यह लगातार छठी तिमाही थी जब इस श्रेणी में गिरावट दर्ज हुई, जो इसकी लंबी सुस्ती को दर्शाता है।
आगे क्या होने वाला है
भविष्य की राह भी फिलहाल आसान नहीं दिखती, हालांकि उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। आईडीसी का अनुमान है कि साल 2026 में भी स्मार्टवॉच बाज़ार दबाव में बना रहेगा, और इसमें एकल अंक के मध्यम स्तर यानी कुछ प्रतिशत की और गिरावट आ सकती है। यह संकेत है कि सुधार जल्दी और अपने आप नहीं आने वाला।
इस दौर में कंपनियों की रणनीति भी बदलती नज़र आ रही है। बहुत सारे उपकरण सस्ते में बेचने के बजाय, ब्रांड अब अधिक मूल्य वाले और बेहतर सुविधाओं से लैस उत्पादों पर ध्यान दे रहे हैं। यानी बाज़ार अब केवल संख्या बढ़ाने के खेल से हटकर गुणवत्ता और कीमत की ओर करवट ले रहा है।
संख्या से गुणवत्ता की ओर
इन सभी आंकड़ों को एक साथ रखकर देखें तो एक बड़ा रुझान उभरता है। भारत का यह बाज़ार अब केवल ज़्यादा से ज़्यादा यूनिट बेचने वाली सोच से आगे बढ़कर बेहतर और महंगे उपकरणों की ओर झुक रहा है। यह वही दिशा है जो देश के स्मार्टफोन बाज़ार में भी बीते कुछ समय से साफ दिखाई देती रही है।
ऐसे में यह गिरावट पूरी तरह नकारात्मक नहीं भी हो सकती, बल्कि एक परिपक्व होते बाज़ार की निशानी भी मानी जा सकती है। शुरुआती उत्साह के थमने के बाद अब ग्राहक शायद सोच समझकर और टिकाऊ उपकरणों पर खर्च करना चाहते हैं, जो लंबे समय में इस उद्योग के लिए स्वस्थ संकेत हो सकता है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, भारत में पहनने योग्य उपकरणों की कहानी इस समय एक अहम मोड़ पर खड़ी है। एक ओर लगातार गिरती बिक्री चिंता पैदा करती है, तो दूसरी ओर महंगे और बेहतर उत्पादों की ओर बढ़ता रुझान एक नई दिशा की उम्मीद भी जगाता है। असली परीक्षा यही होगी कि ब्रांड ग्राहकों का भरोसा दोबारा कैसे जीतते हैं।
आने वाले महीने ही बताएंगे कि यह बाज़ार अपनी इस सुस्ती से कैसे उबरता है और किस रूप में लौटता है। लेकिन इतना तय है कि सस्ते उपकरणों की भीड़ का दौर अब पीछे छूटता दिख रहा है। हम इन आंकड़ों पर आगे भी शांत और तथ्यपरक नज़र बनाए रखेंगे, ताकि इस बदलाव की पूरी तस्वीर सामने रखी जा सके।





